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बैंक आपकी आय देखकर तय करते हैं कि आप कितनी EMI संभाल सकते हैं। आय और चल रही देनदारियां भरकर अंदाज़ा लगाएं कि कितना लोन मिलने की संभावना है।
बैंक FOIR यानी आय का वह हिस्सा देखते हैं जो सभी EMI में जा सकता है। इसमें से चल रही EMI घटाने पर नई EMI की गुंजाइश निकलती है। उस EMI पर तय ब्याज दर और अवधि में जितना लोन चुकाया जा सके, वही पात्रता का अंदाज़ा है।
सूत्र: नई EMI की गुंजाइश = आय × FOIR% − चल रही EMI। लोन = EMI × (1 − (1+r)^−n) ÷ r।
₹80,000 की मासिक नेट आय, ₹10,000 की चल रही EMI और 50% FOIR पर नई EMI की गुंजाइश ₹30,000 बचती है। 9% दर पर 20 साल में यह अनुमानित ₹33,34,349 के लोन के बराबर है।
फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो। यह बताता है कि आपकी आय का कितना हिस्सा लोन की किस्तों में जा रहा है। बैंक अक्सर इसे 40% से 60% के बीच रखते हैं।
चल रही छोटी EMI खत्म करना, को-एप्लिकेंट की आय जोड़ना, अवधि बढ़ाना और क्रेडिट स्कोर सुधारना पात्रता बढ़ा सकते हैं।
नहीं। असली मंज़ूरी में आपकी उम्र, क्रेडिट स्कोर, नौकरी की स्थिरता और प्रॉपर्टी की कीमत भी देखी जाती है।
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अंतिम जांच: 16 अक्टूबर 2026। दरें और नियम बदलते रहते हैं, इसलिए फैसले से पहले आधिकारिक स्रोत या अपने सलाहकार से मिलान कर लें।