UPI पर भी जजिया कर? काला धन बाजार में नहीं निकल रहा था, अब डिजिटल जेब पर भारतीय जेबकट पार्टी की कैंची!

UPI पर भी जजिया कर? काला धन बाजार में नहीं निकल रहा था, अब डिजिटल जेब पर भारतीय जेबकट पार्टी की कैंची!

UPI पर MDR शुल्क की चर्चा और डिजिटल जेब पर असर: तीखा व्यंग्य

भोपाल /राजेंद्र सिंह वरिष्ठ पत्रकार/जनता आवाज़ न्यूज रिसोर्स / 16 सितंबर 2026

मेरे घर के बगल में एक छोटी सी परचूनी की दुकान है। घर का किराना वहीं से आता है। करीब चार हजार रुपये महीने का हिसाब बन जाता है। मैं पत्रकार हूं, इसलिए मेरी कमाई की कोई तय तारीख नहीं होती। कभी पैसे होते हैं, कभी नहीं होते। कभी खबर छप जाती है, कभी खबर छपने के बाद भी मेहनत की कीमत आने में महीनों लग जाते हैं। इसलिए परचूनी वाले से पुराना रिश्ता है। सामान लेते जाइए, हिसाब लिखते जाइए और जब पैसे आएं तो दो-तीन महीने का हिसाब एक साथ चुका दीजिए। यह कोई बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है, लेकिन देश की असली अर्थव्यवस्था ऐसी ही छोटी दुकानों, छोटे कारोबारियों और उधार के भरोसे चलती है।

अब डर यह है कि जब दो-तीन महीने बाद चार हजार रुपये एक साथ देने जाऊंगा तो बनिया पहले यह नहीं पूछेगा कि पैसे आए कहां से, बल्कि शायद यह पूछेगा कि साहब भुगतान कैसे करेंगे? मैं कहूंगा UPI से। वह शायद कहेगा, साहब थोड़ा रुक जाइए, डिजिटल जमाने में अब हिसाब सिर्फ आपका और मेरा नहीं रहा, बीच में सरकार और उसकी व्यवस्था भी खड़ी है।

देश को डिजिटल बनाने का सपना दिखाया गया। कहा गया नकद छोड़िए, डिजिटल भुगतान कीजिए। जनता ने बात मान ली। चाय वाले से लेकर सब्जी वाले तक, दूध वाले से लेकर परचूनी वाले तक, रिक्शे वाले से लेकर बड़े दुकानदार तक सबने QR कोड लगा लिया। जेब में नोट कम हुए और मोबाइल में UPI बढ़ गया। जिस व्यवस्था को सरकार ने डिजिटल क्रांति का चेहरा बताया, अब उसी व्यवस्था में दो हजार रुपये से अधिक के कुछ व्यापारी भुगतानों पर MDR की नई व्यवस्था की चर्चा है। दर 0.4 प्रतिशत है। सुनने में बहुत छोटी रकम लगती है। लेकिन गरीब की जेब में प्रतिशत नहीं होता, रुपये होते हैं। उसके लिए दस रुपये भी रुपये हैं और बीस रुपये भी रुपये हैं।

सरकार कहेगी कि इसे टैक्स मत कहिए। ठीक है, नहीं कहेंगे। इसे MDR कहेंगे, शुल्क कहेंगे, सुविधा लागत कहेंगे, डिजिटल व्यवस्था की लागत कहेंगे, लेकिन आम आदमी तो आखिर यही पूछेगा कि भुगतान करने के लिए भी भुगतान क्यों? नाम बदलने से जेब पर पड़ने वाला असर तो नहीं बदलता। सरकार अगर टैक्स को शुल्क कह दे तो आदमी की जेब में बचा पैसा बढ़ नहीं जाता।

यही तो इस देश की सबसे बड़ी विडंबना है। आदमी अपनी कमाई पर टैक्स देता है, बाजार में जाता है तो सामान पर टैक्स देता है, पेट्रोल भरवाता है तो टैक्स देता है, घर बनाता है तो टैक्स और शुल्क का हिसाब सामने आता है, गाड़ी खरीदता है तो टैक्स, बिजली का बिल देता है तो अलग-अलग शुल्क और अब डिजिटल भुगतान की दुनिया में भी नए हिसाब की चिंता। आदमी कभी-कभी अपनी जेब देखकर सोचता होगा कि यह मेरी जेब है या सरकारी राजस्व विभाग की चलती-फिरती शाखा।

बीजेपी सरकार ने डिजिटल इंडिया को अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिना है। UPI की सफलता निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। दुनिया में भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था की चर्चा होती है। लेकिन सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को जनता ने अपनी सुविधा के लिए अपनाया, उसे धीरे-धीरे शुल्क और लागत के जाल में क्यों घेरा जाए? डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना है तो उसे सरल और सस्ता बनाइए। ऐसा माहौल मत बनाइए कि छोटा दुकानदार QR कोड देखते ही पहले कैलकुलेटर निकाले और फिर ग्राहक से कहे कि साहब, भुगतान करने से पहले हिसाब समझ लीजिए।

मेरा परचूनी वाला कोई बड़ी कंपनी नहीं है। उसके पास वित्त विभाग नहीं है, कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट हर शाम हिसाब देखने नहीं आता। वह सुबह दुकान खोलता है और रात को शटर गिराता है। दिनभर ग्राहक आते हैं। कोई नकद देता है, कोई UPI करता है, कोई उधार लेकर चला जाता है। वह खुद भी थोक व्यापारी से उधार माल लाता है। उसके घर का खर्च उसी दुकान से चलता है। ऐसे आदमी के लिए कारोबार की हर छोटी लागत मायने रखती है।

और कारोबार की लागत आखिर जाती कहां है? कभी दुकानदार अपने मुनाफे से देता है, कभी कीमत में जोड़ देता है। फिर वही कीमत ग्राहक की जेब से निकलती है। फिर महंगाई का सवाल उठता है। सरकार कहती है महंगाई पर विपक्ष राजनीति कर रहा है। विपक्ष कहता है सरकार महंगाई बढ़ा रही है। और जनता बीच में खड़ी अपनी जेब टटोलती है। जेब दोनों से कहती है भाई, पहले मुझे बचाओ।

इस लिए बीजेपी को नया नाम मिल गया है भारतीय जेब कट पार्टी। जेबकतरा कम से कम सामने से आता है। वह आदमी की जेब पर हाथ डालता है और भाग जाता है। आधुनिक व्यवस्था ज्यादा सभ्य है। यहां पहले सुविधा दी जाती है, आदत डलवाई जाती है, व्यवस्था लोकप्रिय बनाई जाती है और फिर उसी व्यवस्था के भीतर शुल्क का नया रास्ता खोज लिया जाता है। आदमी को पता भी नहीं चलता कि उसकी जेब कब हल्की हो गई।

पहले कहा गया नकद कम करो। जनता ने नकद कम किया। कहा गया डिजिटल बनो। जनता डिजिटल बनी। कहा गया UPI अपनाओ। जनता ने UPI अपना लिया। गांव के छोटे दुकानदार ने भी QR कोड दुकान पर चिपका लिया। अब जब डिजिटल भुगतान जीवन का हिस्सा बन चुका है तो उसमें भी लागत का हिसाब आने लगा। यह वैसा ही है जैसे पहले किसी को मुफ्त में चाय की आदत लगाओ और फिर कहो कि कप तो मुफ्त है, चाय की खुशबू का शुल्क अलग लगेगा।

सरकार के पास तर्क होंगे। बैंकिंग व्यवस्था चलाने का खर्च है, तकनीक का खर्च है, साइबर सुरक्षा का खर्च है, डिजिटल ढांचे का खर्च है। बात सही हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि हर खर्च का रास्ता आम आदमी की जेब से ही क्यों होकर जाता है? सरकार का काम केवल राजस्व जुटाना नहीं, जनता के जीवन को आसान बनाना भी है। यदि डिजिटल भुगतान से छोटे व्यापारी को अतिरिक्त बोझ महसूस होगा तो अंततः उसका असर बाजार पर पड़ेगा।

गरीब आदमी के लिए 16 रुपये की बात करने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि गरीब का पूरा महीना ही छोटे-छोटे रुपयों से बनता है। किसी के लिए 16 रुपये कॉफी के बिल में आने वाली रकम है, लेकिन किसी मजदूर के लिए यही 16 रुपये घर की चीनी, चाय या बच्चों के बिस्किट का हिस्सा हैं। किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह मामूली रकम हो सकती है, लेकिन जिस घर में महीने का हिसाब सौ-सौ रुपये जोड़कर बनता है, वहां हर रुपया महत्वपूर्ण है।

देश को बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना है तो छोटी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। संसद में करोड़ों-अरबों की योजनाओं पर चर्चा होती है, लेकिन देश की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था उस परचूनी की दुकान में सांस लेती है जहां ग्राहक महीनेभर का सामान उधार लेकर जाता है और तनख्वाह आने पर हिसाब चुकाता है। उस चाय वाले की दुकान में अर्थव्यवस्था चलती है जहां सुबह मजदूर दस रुपये की चाय पीता है। उस सब्जी वाले के ठेले पर अर्थव्यवस्था चलती है जहां ग्राहक बीस रुपये की सब्जी लेकर जाता है। उस छोटे दुकानदार के QR कोड में भी भारत की अर्थव्यवस्था छिपी है।

इसलिए सवाल 0.4 प्रतिशत का नहीं है। सवाल यह है कि जनता को हर नई व्यवस्था के साथ यह क्यों सुनना पड़ता है कि चिंता मत करो, बहुत थोड़ा है। गरीब के लिए थोड़ा भी बहुत होता है। उसकी जेब में कोई अतिरिक्त शून्य नहीं होता।

कल तक सरकार कह रही थी कि नकद रखोगे तो जोखिम है, डिजिटल करो। आज डिजिटल करोगे तो शुल्क का डर। कल पता नहीं किस सुविधा पर कौन-सा नया चार्ज सामने आ जाए। आदमी को डर लगने लगा है कि कहीं कल सांस लेने के लिए भी कोई डिजिटल सुविधा शुल्क न आ जाए और सरकार यह कहकर बच निकले कि यह टैक्स नहीं, ऑक्सीजन मैनेजमेंट MDR है।

लेख अपनी जगह है, लेकिन सवाल बेहद गंभीर है। सरकार जनता को डिजिटल बनाना चाहती है तो डिजिटल व्यवस्था पर भरोसा भी बनाए रखना होगा। UPI को ऐसा माध्यम बनाइए जिसमें ग्राहक और छोटा व्यापारी दोनों सहज महसूस करें। ऐसा नहीं कि QR कोड देखकर ग्राहक भुगतान करने से पहले दुकानदार से पूछे भैया, इसमें सरकार का कितना हिस्सा है?

बीजेपी ने राजनीति में बहुत नारे दिए हैं। अब जनता भी अपना छोटा सा नारा बना सकती है नोटबंदी सह ली, GST समझ लिया, डिजिटल इंडिया अपना लिया, अब जेब पर और कितनी कैंची चलेगी?

क्योंकि जनता ने सरकार को अपनी जेब सौंपने के लिए वोट नहीं दिया है। उसने सरकार को देश चलाने के लिए चुना है। जेब उसकी अपनी है और उसमें बचे आखिरी रुपये पर भी उसका हक है।

इसलिए डिजिटल भारत बनाइए, लेकिन ऐसा डिजिटल भारत नहीं जहां आदमी भुगतान करते समय मोबाइल से पहले अपनी जेब देखे। UPI को मजबूत कीजिए, लेकिन जनता के भरोसे को कमजोर मत कीजिए। टैक्स हो या शुल्क, नाम चाहे जो हो, गरीब की जेब पर पड़ने वाला हर अतिरिक्त बोझ आखिर बोझ ही होता है।

और मेरे परचूनी वाले को मैं अब शायद यही कहूंगा भाई, चार हजार का हिसाब बाद में चुका दूंगा, लेकिन भुगतान करने से पहले जरा यह बता देना कि तुम्हारी दुकान तक पहुंचते-पहुंचते मेरे चार हजार में कितने विभागों की नजर लग चुकी है।

वह बेचारा शायद मुस्कुराकर कहेगा साहब, दुकान मेरी है, सामान मेरा है, QR मेरा है, ग्राहक आप हैं… लेकिन हिसाब अब हमारा कहां रहा?

यही तो नए भारत की नई कहानी है जेब पहले भी जनता की थी, आज भी जनता की है, बस जेब तक पहुंचने के तरीके आधुनिक हो गए हैं। और अगर हर सुविधा के पीछे नया शुल्क खड़ा होगा तो जनता एक दिन सचमुच पूछेगी साहब, डिजिटल इंडिया बन गया, लेकिन मेरी जेब का इंडिया कब बचेगा?

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