रेवड़ियों पर हजारों करोड़, UPI की लागत पर बड़ा सवाल

राजकुमार अग्रवाल17 September 202613 min read14 viewsOpinion
रेवड़ियों पर हजारों करोड़, UPI की लागत पर बड़ा सवाल

चुनावी योजनाओं पर ₹9.73 लाख करोड़, तो UPI मुफ्त रखने में हिचक क्यों?

16वें वित्त आयोग के आंकड़े और राज्यों की कैश ट्रांसफर योजनाओं के बीच UPI को मुफ्त रखने पर उठी बहस। जानिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की वित्तीय लागत, सब्सिडी आवंटन और करदाताओं के पक्ष-विपक्ष का पूरा विश्लेषण।

भारत में केंद्र और राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य में कल्याणकारी योजनाओं (Cash Transfer Schemes) का बजट लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। मध्य प्रदेश में 'लाड़ली बहना', महाराष्ट्र में 'लाडकी बहिन', कर्नाटक में 'गृह लक्ष्मी', पश्चिम बंगाल में 'लक्ष्मीर भंडार', झारखंड में 'मंईयां सम्मान' और ओडिशा में 'सुभद्रा' जैसी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं की लंबी कतार खड़ी हो चुकी है।

नई दिल्ली/16 सितंबर 2026 /जनता आवाज़ न्यूज रिसोर्स

भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों में दो तस्वीरें लगभग साथ-साथ दिखाई देती हैं। एक तरफ राज्यों में महिलाओं और दूसरे वर्गों के खातों में सीधे पैसा भेजने वाली योजनाओं का विस्तार हुआ है। दूसरी तरफ देश की डिजिटल भुगतान व्यवस्था UPI इतनी तेजी से बढ़ी है कि अब उसके संचालन, सुरक्षा, सर्वर, बैंकिंग नेटवर्क और तकनीकी ढांचे की लागत पर गंभीर चर्चा जरूरी हो गई है।

यहीं से एक सीधा सवाल पैदा होता है। अगर सरकारें बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष नकद सहायता योजनाओं के लिए बजट बना सकती हैं, तो देश की डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक मजबूत रखने के लिए टिकाऊ वित्तीय मॉडल क्यों नहीं बनाया जा सकता? यह सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक वित्त और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल भी है।

हालांकि यहां एक तथ्य साफ करना जरूरी है। UPI पूरी तरह खत्म होने या आम नागरिक से शुल्क लेने की स्थिति में नहीं है। 15 सितंबर 2026 को वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान मुफ्त रहेगा। ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान और निर्धारित छोटे व्यापारियों के लेन-देन भी शून्य MDR के दायरे में रहेंगे। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत P2M यानी व्यक्ति से व्यापारी लेन-देन भी प्रभावित नहीं होंगे।

इसके साथ ही बड़े व्यापारी लेन-देन के लिए नया MDR ढांचा लागू किया गया है। सरकार के अनुसार ₹2,000 से अधिक के कुछ P2M लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर इसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेन-देन बताई गई है। जरूरी बात यह है कि यह राशि सीधे ग्राहक से लिया जाने वाला “UPI टैक्स” नहीं है। MDR भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और दूसरे हिस्सेदारों के बीच बांटी जाती है।

इसलिए मौजूदा बहस को “UPI पर टैक्स लग गया” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। सरकार ने भी अप्रैल 2025 में ₹2,000 से ऊपर UPI पर GST लगाने की खबरों को गलत बताया था।

कर दायरा और आम नागरिक की जेब पर प्रभाव

2014 के बाद देश में कर प्रणाली में व्यापक बदलाव किए गए हैं। जुलाई 2017 में माल एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद दैनिक उपभोग की वस्तुओं से लेकर सेवाओं तक पर अप्रत्यक्ष कर का दायरा विस्तृत हुआ है। जीएसटी संग्रह में हुई वृद्धि के साथ-साथ प्रत्यक्ष कर (इनकम टैक्स) देने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। आलोचकों और आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि जब आम जनता और करदाता हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर (Tax) चुका रहे हैं, तो सार्वजनिक उपयोगिता (Public Utility) की सेवाओं जैसे डिजिटल भुगतान को पूरी तरह करदाताओं के पैसे से ही निशुल्क रखा जाना चाहिए।

राज्यों में बढ़ता कैश ट्रांसफर खर्च

दूसरी तरफ राज्यों की प्रत्यक्ष नकद सहायता योजनाओं का आकार वास्तव में काफी बढ़ चुका है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार महिलाओं सहित unconditional cash transfer यानी बिना किसी तत्काल शर्त वाली नकद हस्तांतरण योजनाओं पर वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग ₹1.7 लाख करोड़ खर्च होने का अनुमान था। इन योजनाओं की संख्या भी FY23 से FY26 के बीच पांच गुने से ज्यादा बढ़ी।

16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट इस तस्वीर को और व्यापक बनाती है। आयोग ने 21 राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया कि इन राज्यों में सब्सिडी और ट्रांसफर का कुल बजट 2018-19 में ₹3.86 लाख करोड़ था। 2023-24 में यह लगभग ₹7.59 लाख करोड़ हुआ और 2025-26 के बजट अनुमान में यह ₹9.73 लाख करोड़ तक पहुंच गया।

लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है। ₹9.73 लाख करोड़ को केवल महिलाओं को बांटे जाने वाले पैसे या “रेवड़ियों” की रकम कहना गलत होगा। इसमें अलग-अलग प्रकार की सब्सिडी और ट्रांसफर शामिल हैं। 16वें वित्त आयोग ने बताया कि 2025-26 में इन 21 राज्यों के बड़े unconditional transfers का हिस्सा करीब ₹1.96 लाख करोड़ था।

विषय उपलब्ध आंकड़ा अवधि/स्थिति
21 राज्यों की सब्सिडी व ट्रांसफर ₹9.73 लाख करोड़ FY 2025-26 BE
उन्हीं राज्यों में 2018-19 ₹3.86 लाख करोड़ FY 2018-19
महिलाओं सहित UCT खर्च करीब ₹1.7 लाख करोड़ FY 2025-26
बड़े unconditional transfers करीब ₹1.96 लाख करोड़ FY 2025-26 BE, 21 राज्य
UPI low-value incentive scheme ₹1,500 करोड़ FY 2024-25
UPI P2P मुफ्त सितंबर 2026 से जारी
करीब P2M transactions 96% मुफ्त/प्रभावित नहीं सितंबर 2026
बड़े P2M पर MDR 0.4% निर्धारित लेन-देन पर

इन आंकड़ों से यह बात सामने आती है कि नकद हस्तांतरण योजनाओं और डिजिटल भुगतान व्यवस्था की वित्तीय प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए दोनों की रकम को सीधे एक-दूसरे के बराबर रखना उचित नहीं होगा।

UPI के लिए सरकार पहले भी पैसा दे चुकी है

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सरकार ने UPI को आर्थिक सहायता नहीं दी, ऐसा कहना सही नहीं है। मार्च 2025 में केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2024-25 के लिए कम मूल्य वाले BHIM-UPI P2M लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए ₹1,500 करोड़ की incentive scheme मंजूर की थी। इसमें छोटे व्यापारियों के लिए ₹2,000 तक के लेन-देन पर 0.15 प्रतिशत प्रोत्साहन का प्रावधान था।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इससे पहले भी UPI और RuPay को प्रोत्साहन देने के लिए भुगतान किए गए थे। FY2021-22 में BHIM-UPI के लिए सरकारी payout ₹957 करोड़, FY2022-23 में ₹1,802 करोड़ और FY2023-24 में ₹3,268 करोड़ बताया गया है।

इसका मतलब यह है कि UPI के पीछे सार्वजनिक वित्तीय समर्थन पहले से मौजूद रहा है। अब नई व्यवस्था में सरकार का जोर यह है कि बड़े व्यापारी लेन-देन से मिलने वाली MDR आय का इस्तेमाल भुगतान तंत्र को ज्यादा टिकाऊ बनाने में किया जाए।

असली सवाल UPI की कीमत से ज्यादा उसके मॉडल का है

UPI का इस्तेमाल केवल मोबाइल पर QR code स्कैन करने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बैंकिंग सर्वर, साइबर सुरक्षा, नेटवर्क, डेटा सेंटर, तकनीकी कर्मचारियों, fraud monitoring, customer support और चौबीसों घंटे उपलब्धता जैसी व्यवस्थाएं होती हैं।

जितना अधिक डिजिटल भुगतान बढ़ता है, उतना ही ज्यादा इन व्यवस्थाओं को मजबूत रखना पड़ता है। यदि लेन-देन की संख्या लगातार बढ़ती है, लेकिन भुगतान व्यवस्था से जुड़े संस्थानों को कोई टिकाऊ राजस्व मॉडल नहीं मिलता, तो लंबे समय में सवाल उठना स्वाभाविक है कि लागत कौन उठाएगा।

इसी वजह से सितंबर 2026 का MDR ढांचा सामने आया है। सरकार का तर्क है कि सामान्य नागरिक और छोटे व्यापारी सुरक्षित रहें, जबकि बड़े व्यापारी लेन-देन से भुगतान इकोसिस्टम को कुछ राजस्व मिले।

यह मॉडल कितना सफल होता है, इसका फैसला आने वाले वर्षों के आंकड़े करेंगे। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे UPI को आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बना दिया गया है।

महिलाओं की योजनाओं को सिर्फ “रेवड़ी” कहना भी अधूरा होगा

नकद हस्तांतरण योजनाओं पर चर्चा करते समय दूसरी तरफ का पक्ष भी समझना जरूरी है। आर्थिक सर्वेक्षण ने इनके वित्तीय दबाव की बात जरूर कही है, लेकिन उसने यह भी माना है कि ऐसी योजनाएं महिलाओं को तत्काल आय सहायता देती हैं और स्वास्थ्य तथा व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं।

2026 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े एक अध्ययन ने भी महिलाओं को सीधे नकद सहायता देने वाली योजनाओं के असर का अध्ययन किया। रिपोर्टों के अनुसार ऐसे कार्यक्रम अब 15 से ज्यादा राज्यों में हैं और करीब 12 करोड़ महिलाओं तक पहुंचते हैं। अध्ययन में कुछ राज्यों में बचत, बैंक खाते में शेष राशि और खर्च के व्यवहार में बदलाव भी दर्ज किए गए।

इसलिए इन योजनाओं को केवल चुनावी “रेवड़ी” कहकर पूरा विषय खत्म कर देना भी सही नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि उनका लाभ कितना लक्षित है, कितने समय तक जारी रहना चाहिए, उनके लिए स्थायी राजस्व कहां से आएगा और क्या उनके साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा कौशल में निवेश भी बढ़ रहा है।

सवाल तब गंभीर होता है जब खर्च का हिसाब साफ न हो

लोकतंत्र में सरकार किसी भी योजना पर पैसा खर्च कर सकती है, लेकिन उस पैसे का स्रोत और परिणाम जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए। अगर किसी योजना पर ₹20,000 करोड़, ₹30,000 करोड़ या उससे अधिक खर्च हो रहा है तो यह बताना जरूरी है कि पैसा कहां से आया और अगले पांच या दस साल में उसका असर क्या होगा।

इसी तरह UPI को सुरक्षित और मजबूत रखने के लिए अगर हजारों करोड़ रुपये की जरूरत है तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि उसका भुगतान कौन करेगा। बैंक करेंगे, बड़े व्यापारी करेंगे, केंद्र सरकार करेगी या कोई साझा मॉडल बनेगा?

यहां तुलना करने का सही तरीका यह नहीं है कि महिलाओं को पैसा क्यों दिया जा रहा है और UPI को क्यों नहीं। दोनों की सामाजिक और आर्थिक भूमिका अलग है। सही सवाल यह है कि हर सार्वजनिक खर्च का उद्देश्य, लागत और परिणाम क्या है।

मोदी सरकार और सरकारी प्रचार का सवाल

अब आता है वह मुद्दा जिस पर राजनीतिक बहस लंबे समय से चलती रही है—सरकारी योजनाओं और विज्ञापनों में प्रधानमंत्री या राजनीतिक नेताओं की तस्वीर।

यह तथ्य है कि कोविड-19 टीकाकरण प्रमाणपत्रों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल हुआ था। 2021 में इस तस्वीर को लेकर चुनाव आयोग के पास शिकायत भी पहुंची थी और आयोग ने स्वास्थ्य मंत्रालय से तथ्यात्मक स्थिति मांगी थी।

इस विषय पर अदालत में भी मामला पहुंचा। केरल हाई कोर्ट में एक याचिका में प्रधानमंत्री की तस्वीर वाले कोविड टीकाकरण प्रमाणपत्र को चुनौती दी गई थी।

लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए थे। अदालत ने कहा था कि सरकारी विज्ञापन का उद्देश्य जनता को सरकार की नीतियों, योजनाओं, अधिकारों और सेवाओं के बारे में जानकारी देना होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति को प्रचारित करना।

बाद में 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में बदलाव किया और राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा संबंधित मंत्री की तस्वीरों के इस्तेमाल की अनुमति से जुड़ी व्यवस्था स्पष्ट की।

इसलिए यह कहना कि “हर सरकारी विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाना गैरकानूनी है” भी सही नहीं होगा। मामला परिस्थितियों, विज्ञापन के उद्देश्य और लागू दिशा-निर्देशों पर निर्भर करता है।

लेकिन खर्च कितना हुआ?

प्रधानमंत्री की तस्वीर वाले कार्यक्रमों या विदेश यात्राओं के प्रचार पर “सैकड़ों करोड़” या “हजारों करोड़” खर्च होने का दावा बिना दस्तावेजी स्रोत के नहीं किया जाना चाहिए।

ऐसे खर्चों को अलग-अलग मदों में देखना पड़ता है—सरकारी विज्ञापन, आयोजन, विदेश यात्रा, सुरक्षा, मीडिया प्रोडक्शन, डिजिटल प्रचार, आयोजन स्थल, संचार और दूसरे प्रशासनिक खर्च। इन सबको जोड़कर एक संख्या को “प्रधानमंत्री की फोटो का खर्च” कहना लेखांकन की दृष्टि से सही नहीं होगा।

इसलिए इस लेख में ऐसी कोई अप्रमाणित रकम नहीं दी जा रही है। जहां सरकारी या संवैधानिक स्रोत से सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है,

यही सिद्धांत UPI और cash transfer दोनों पर लागू होना चाहिए।

टैक्स का सवाल भी इसी बहस का हिस्सा है

भारत में सरकार को पैसा मुख्य रूप से टैक्स और गैर-कर राजस्व से मिलता है। GST, आयकर, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, कॉरपोरेट टैक्स और दूसरे राजस्व स्रोतों से सरकार अपना खर्च चलाती है।

इसलिए जब कोई सरकार किसी योजना पर पैसा खर्च करती है तो अंततः उसके वित्तीय प्रभाव का संबंध जनता से ही होता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर सरकारी खर्च सीधे किसी एक नागरिक के टैक्स से उसी दिन वसूला जा रहा है।

UPI के मामले में भी यही बात समझनी जरूरी है। सरकार द्वारा दिए गए incentive और MDR व्यवस्था को “UPI टैक्स” कहना सही नहीं है। सरकार ने सितंबर 2026 में साफ किया है कि MDR ग्राहक से वसूला जाने वाला सरकारी टैक्स नहीं है।

भारत के सामने असली चुनौती क्या है?

भारत ने डिजिटल भुगतान में बड़ी छलांग लगाई है। जुलाई 2026 में UPI ने अकेले एक महीने में 2,366 करोड़ लेन-देन किए, जिनका कुल मूल्य करीब ₹29.9 लाख करोड़ बताया गया। UPI अब भारत के बाहर भी कई देशों में उपलब्ध है।

इतने बड़े नेटवर्क को लंबे समय तक सुरक्षित और भरोसेमंद रखना अपने आप में एक बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी है।

अगर UPI में तकनीकी समस्या आती है तो उसका असर केवल किसी एक बैंक या ऐप पर नहीं पड़ता। छोटे दुकानदार, बड़े कारोबारी, ऑनलाइन कंपनियां, टैक्सी चालक, रेहड़ी वाले और आम ग्राहक सभी प्रभावित होते हैं।

इसलिए UPI को केवल “मुफ्त भुगतान सुविधा” के रूप में देखना अधूरा होगा। यह अब भारत के आर्थिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

नकद सहायता और डिजिटल ढांचे में संतुलन जरूरी

सरकारों के सामने चुनौती यह है कि वे गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सहायता भी दें और भविष्य के लिए मजबूत आर्थिक ढांचा भी तैयार करें।

यदि नकद सहायता लगातार बढ़ती जाती है लेकिन रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और उत्पादन क्षमता पर पर्याप्त निवेश नहीं होता तो आने वाले वर्षों में वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण ने भी cash transfer schemes की बढ़ती मात्रा के साथ इसी तरह के fiscal trade-off की ओर ध्यान दिलाया है।

दूसरी ओर, यदि सरकार डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत नहीं करती तो UPI जैसे सिस्टम की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए सवाल “महिलाओं को पैसा दें या UPI पर पैसा खर्च करें” का नहीं होना चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि दोनों क्षेत्रों में कितना खर्च उचित है, पैसा कहां से आएगा और उसका सार्वजनिक लाभ कितना होगा।

जनता को क्या पूछना चाहिए?

जनता को सरकार से कुछ सीधे सवाल पूछने चाहिए।

पहला—हर बड़ी नकद सहायता योजना का कुल वार्षिक खर्च कितना है?

दूसरा—उस योजना के कितने वास्तविक लाभार्थी हैं और प्रति लाभार्थी सरकार की लागत कितनी है?

तीसरा—UPI के संचालन और प्रोत्साहन पर केंद्र सरकार हर साल कितना खर्च करती है?

चौथा—MDR से भुगतान इकोसिस्टम को कितनी आय होगी और उसका इस्तेमाल किस मद में किया जाएगा?

पांचवां—सरकारी विज्ञापन और प्रचार पर केंद्र तथा राज्यों का कुल खर्च कितना है?

छठा—सरकारी विज्ञापनों में राजनीतिक व्यक्तियों की तस्वीरों के इस्तेमाल का नियम क्या है और उसका पालन कैसे सुनिश्चित किया जाता है?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों और बजट आंकड़ों से मिलने चाहिए, राजनीतिक नारों से नहीं।

भारत में cash transfer योजनाओं का आकार तेजी से बढ़ा है। 21 राज्यों के लिए 2025-26 में सब्सिडी और ट्रांसफर का कुल बजट ₹9.73 लाख करोड़ बताया गया है, जबकि महिलाओं सहित unconditional cash transfer योजनाओं का अनुमान करीब ₹1.7 लाख करोड़ है।

उधर UPI को लेकर भी सरकार ने अब एक नया वित्तीय ढांचा तैयार किया है। आम P2P भुगतान मुफ्त रहेगा और सरकार के अनुसार लगभग 96 प्रतिशत merchant transactions भी प्रभावित नहीं होंगे। बड़े निर्दिष्ट merchant transactions पर MDR से भुगतान व्यवस्था को राजस्व मिलने की उम्मीद है।

इसलिए आज की बहस को “सरकार रेवड़ियों पर पैसा खर्च कर रही है लेकिन UPI पर पैसा नहीं” जैसे सीधे निष्कर्ष में बदलना तथ्यों को सरल बनाना होगा। वास्तविक तस्वीर इससे ज्यादा जटिल है।

हां, यह सवाल पूरी तरह जायज है कि सार्वजनिक धन की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए। महिलाओं को मिलने वाली सहायता हो, डिजिटल भुगतान का ढांचा हो या सरकारी प्रचार—हर जगह पारदर्शिता, लागत और परिणाम का हिसाब जनता के सामने होना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकारों को खर्च करने का अधिकार है, लेकिन जनता को उस खर्च का हिसाब मांगने का अधिकार भी है।

और शायद आज की सबसे जरूरी बहस यही है—सरकार पैसा कहां खर्च कर रही है, क्यों खर्च कर रही है और उस खर्च का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है?

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