टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स विवाद के बीच जस्टिस नरीमन की कानूनी राय आई सामने, स्वतंत्र निर्णय लेने को लेकर कही यह बात

टाटा संस और इसके बहुसंख्यक शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के बीच बोर्ड के अहम फैसलों को लेकर चल रहे शासन विवाद के बीच, अप्रैल 2025 की एक कानूनी राय चर्चा में आ गई है। यह कानूनी राय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. एफ. नरीमन द्वारा 13 अप्रैल 2025 को दी गई थी, जिसमें कहा गया है कि टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट्स द्वारा नामित डायरेक्टर केवल ट्रस्टियों के निर्देशों का पालन नहीं कर सकते हैं। इन डायरेक्टर्स को कंपनी के डायरेक्टर के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय स्वतंत्र निर्णय का उपयोग करना होगा।
यह कानूनी राय उस प्रस्तावित प्रोटोकॉल की जांच के दौरान दी गई थी जिसके तहत सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के नॉमिनी डायरेक्टर्स को ट्रस्टियों से प्राप्त मार्गदर्शन के अनुसार वोट करना या अनुपस्थित रहना आवश्यक होता। यह प्रोटोकॉल दोनों ट्रस्टों द्वारा 17 अक्टूबर 2024 को पारित एक प्रस्ताव से उपजा था। यह राय एन चंद्रशेखरन को टाटा संस के चेयरमैन के रूप में दोबारा नियुक्त करने और कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के प्रस्ताव जैसे मुद्दों पर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेदों के संदर्भ में सामने आई है।
- टाटा संस ने 17 सितंबर 2026 की अपनी बोर्ड बैठक में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को पांच साल के कार्यकाल के लिए मंजूरी दी थी।
- टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इन फैसलों का विरोध किया, जबकि दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने इनका समर्थन किया।
- टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और ट्रस्ट्स का तर्क है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत ट्रस्ट-नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन जरूरी है।
- जस्टिस नरीमन की 13 अप्रैल 2025 की राय के अनुसार, नॉमिनी डायरेक्टर्स को ट्रस्टियों के मार्गदर्शन के अनुसार सख्ती से वोट करने या अनुपस्थित रहने के लिए कहना कानून के खिलाफ है।
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद की वजह
टाटा संस की बोर्ड बैठक में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति और कंपनी की स्टॉक मार्केट लिस्टिंग को मंजूरी दी गई थी। टाटा ट्रस्ट्स ने इस नियुक्ति की वैधता को चुनौती दी और कहा कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुसार ट्रस्ट-नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स के बहुमत का सकारात्मक समर्थन आवश्यक है। बोर्ड में केवल दो ट्रस्ट नॉमिनी होने के कारण ट्रस्ट्स का तर्क है कि दोनों को इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए पक्ष में वोट करना होगा। टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार 17 सितंबर का प्रस्ताव कानूनी रूप से प्रभावी नहीं था।
जस्टिस नरीमन की कानूनी राय और कंपनियों अधिनियम की धारा 166
जस्टिस नरीमन ने इस व्यवस्था की जांच कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 के संदर्भ में की थी। यह धारा डायरेक्टर्स के फिड्यूशियरी कर्तव्यों को तय करती है, जिसमें कंपनी और उसके शेयरधारकों के हितों में सद्भावना से काम करना और उचित देखभाल, कौशल, मुस्तैदी तथा स्वतंत्र निर्णय का उपयोग करना शामिल है। जस्टिस नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट के 26 मार्च 2021 के उस फैसले का भी हवाला दिया जिसमें चैरिटेबल ट्रस्ट्स द्वारा नामित डायरेक्टर्स की स्थिति और कर्तव्यों पर विचार किया गया था।
जस्टिस नरीमन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस अवलोकन का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता है कि नॉमिनी डायरेक्टर का स्वतंत्र निर्णय का दायित्व खत्म हो जाता है। उन्होंने कहा कि नॉमिनी डायरेक्टर ट्रस्टियों के विचारों को ध्यान में रख सकता है और साथ ही उस कंपनी के प्रति अपने फिड्यूशियरी कर्तव्यों सहित अन्य प्रासंगिक मामलों पर भी विचार कर सकता है। ट्रस्टियों के मार्गदर्शन का पालन न करने पर डायरेक्टर के नामांकन को वापस लेने की संभावना वैधानिक दायित्व के खिलाफ होगी।