सुप्रीम कोर्ट ने को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों में SEBI और NSE के बीच सेटलमेंट की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों में SEBI और NSE के बीच सेटलमेंट की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी SEBI और नेशनल स्टॉक Exchange यानी NSE के बीच लंबे समय से चल रहे को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों में सेटलमेंट की अनुमति दे दी है। इस फैसले के साथ ही इन मामलों से जुड़ी सभी विनियामक कार्यवाहियां समाप्त हो गई हैं।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने सेटलमेंट की अनुमति दी और इससे जुड़े लंबित मामलों का निपटारा कर दिया। यह सेटलमेंट SEBI के सेटलमेंट मैकेनिज्म के तहत NSE द्वारा कुल 1,491.21 करोड़ रुपये के भुगतान को कवर करता है।

  • इस कुल राशि में को-लोकेशन मामले के लिए 1,223.56 करोड़ रुपये शामिल हैं।
  • डार्क फाइबर मामले के लिए 267.65 करोड़ रुपये की राशि तय की गई है।
  • NSE ने पहले ही SEBI के पास 776.47 करोड़ रुपये जमा कर दिए थे।
  • SEBI द्वारा सेटलमेंट प्रस्ताव स्वीकार करने के बाद NSE ने 714.74 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया।
  • इस तरह 1,491.21 करोड़ रुपये का पूरा सेटलमेंट पूरा हो गया।

मामले की पृष्ठभूमि और आरोप

ये मामले इस आरोप से जुड़े हैं कि कुछ ब्रोकरों द्वारा NSE के को-लोकेशन बुनियादी ढांचे और ट्रेडिंग डेटा तक किस तरह से पहुंच बनाई गई थी। को-लोकेशन मामले में SEBI की कार्यवाही टिक-बाय-टिक डेटा फीड तक पसंदीदा पहुंच और ट्रेडिंग बुनियादी ढांचे तक निष्पक्ष पहुंच सुनिश्चित करने में NSE की प्रणाली की कमियों से संबंधित थी।

इन कार्यवाहियों में रैंडमाइज़र की अनुपस्थिति, आईपी आवंटन, लोड-बालेंसिंग और सेकेंडरी सर्वर तक पहुंच जैसे मुद्दों की भी जांच की गई थी। डार्क फाइबर विवाद एक अनधिकृत सेवा प्रदाता के माध्यम से कुछ ब्रोकरों को प्रदान की गई पॉइंट-टू-पॉइंट कनेक्टिविटी से संबंधित था। SEBI की जांच में NSE के को-लोकेशन सुविधा और BSE के को-लोकेशन सुविधा के बीच कनेक्टिविटी और ऐसी कनेक्टिविटी से प्राप्त कथित लाभ की जांच की गई थी।

विवाद का पुराना इतिहास और SAT का आदेश

यह विवाद लगभग एक दशक पुराना है और 30 अप्रैल 2019 को SEBI के पूर्णकालिक सदस्य ने एक आदेश पारित किया था। इस आदेश में NSE को 1 अप्रैल 2014 से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 624.89 करोड़ रुपये निवेशक सुरक्षा और शिक्षा कोष में जमा करने का निर्देश दिया गया था।

NSE ने इस आदेश को सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी SAT के समक्ष चुनौती दी थी। जनवरी 2023 में SAT ने पैसे वापस करने के उस निर्देश को रद्द कर दिया था। हालांकि ट्रिब्यूनल ने यह मानते हुए कि एक्सचेंज ने निष्पक्ष पहुंच और उचित मुस्तैदी सुनिश्चित करने में चूक की है, NSE को निवेशक सुरक्षा और शिक्षा कोष में 100 करोड़ रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में अपील और वर्तमान स्थिति

SEBI ने बाद में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी चुनौतियों को आगे बढ़ाया था। अंततः दोनों पक्षों ने सेटलमेंट की दिशा में कदम बढ़ाया और मार्च 2026 में NSE ने 1,491.21 करोड़ रुपये के संशोधित सेटलमेंट की शर्तें दाखिल कीं।

NSE के अपने नियामक खुलासों में कहा गया था कि सेटलमेंट आवेदनों में को-लोकेशन और डार्क फाइबर ऑर्डर शामिल थे। SEBI ने जुलाई में सेटलमेंट स्वीकार कर लिया और NSE द्वारा पहले ही जमा किए गए 776.47 करोड़ रुपये को समायोजित करने के बाद शेष 714.74 करोड़ रुपये की मांग उठाई।

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इसके समक्ष इन दोनों मामलों से उत्पन्न होने वाली कार्यवाही समाप्त हो गई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब NSE का पहला आरंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी IPO सब्सक्रिप्शन के लिए खुला हुआ है।

यह IPO 17 सितंबर को खुला था और 21 सितंबर को बंद होगा, जिसके लिए प्राइस बैंड 1,700 रुपये से 1,785 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है। इस मामले में SEBI का प्रतिनिधित्व एक्स्प्लेटस लीगल ने किया, जबकि एडवोकेट अभिज्ञान झा ने NSE का प्रतिनिधित्व किया।

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