रुपया निकट भविष्य में 94.5 से 96 प्रति डॉलर के दायरे में रहने की संभावना

रुपया निकट भविष्य में 94.5 से 96 प्रति डॉलर के दायरे में रहने की संभावना

मुंबई (महाराष्ट्र) में 26 सितंबर को बैंक ऑफ बड़ौदा की एक रिसर्च रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार निकट भविष्य में रुपया यूएस डॉलर के मुकाबले 94.5 से 96 के दायरे में रह सकता है। एफसीएनआर डिपॉजिट्स और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग यानी ईसीबी के जरिए बड़े पैमाने पर डॉलर इनफ्लो आने के बावजूद रुपये में कोई खास मजबूती देखने को नहीं मिली है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि ये फंड रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई के रिजर्व में जोड़ दिए गए हैं। रुपये की चाल अब फंडामेंटल्स, आरबीआई के दखल और मार्केट सेंटीमेंट पर निर्भर कर रही है। इन सब वजहों से किसी एक कारक के आधार पर करेंसी में होने वाले बदलाव को तय करना मुश्किल हो गया है।

  • निकट भविष्य में रुपया 94.5 से 96 प्रति डॉलर के दायरे में रह सकता है।
  • जनवरी 2022 में औसत 74.44 रुपये प्रति डॉलर से रुपया अगस्त 2026 में 95.47 रुपये पर पहुंच गया है।
  • जनवरी 2022 से अगस्त 2026 के बीच रुपये में करीब 28 प्रतिशत की गिरावट आई है।
  • इसी अवधि में डॉलर के मुकाबले यूरो में 2.4 प्रतिशत की तेजी आई है।
  • येन, इंडोनेशियाई रुपिया और दक्षिण कोरियाई वॉन में क्रमशः 38 प्रतिशत, 24 प्रतिशत और 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

डॉलर इनफ्लो और आरबीआई रिजर्व की स्थिति

रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉलर इनफ्लो बढ़ने के बाद सैद्धांतिक तौर पर रुपये में तेज मजबूती आ सकती थी। लेकिन यह मजबूती सीमित रही क्योंकि इनफ्लो को मार्केट में नहीं उतारा गया बल्कि उसे रिजर्व में जोड़ दिया गया। रुपया जनवरी 2022 के औसत 74.44 प्रति डॉलर से गिरकर अगस्त 2026 में 95.47 पर आ गया, जिससे इसमें लगभग 28 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसी अवधि के दौरान डॉलर ने यूरो के मुकाबले 2.4 प्रतिशत की बढ़त हासिल की है। जबकि येन, इंडोनेशियाई रुपिया और दक्षिण कोरियाई वॉन में क्रमशः 38 प्रतिशत, 24 प्रतिशत और 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

करेंसी मूवमेंट के आंकड़े और विश्लेषण

इस रिसर्च रिपोर्ट में जनवरी 2022 से जून 2026 तक के मासिक करेंसी मूवमेंट का विश्लेषण किया गया है। इसके लिए फॉरेक्स रिजर्व में बदलाव, आरबीआई की स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट गतिविधियों, एफपीआई फ्लो और डॉलर-यूरो एक्सचेंज रेट का इस्तेमाल किया गया है। अध्ययन किए गए वैरिएबल्स में से आरबीआई के स्पॉट और फॉरवर्ड ऑपरेशंस का रुपये की चाल के साथ गहरा संबंध देखा गया है। इन दोनों का एक साथ इस्तेमाल करने पर इनकी एक्सप्लेनेटरी पावर 34 प्रतिशत रही। जबकि अलग-अलग देखने पर स्पॉट की 25 प्रतिशत और फॉरवर्ड ऑपरेशंस की 19 प्रतिशत रही।

विभिन्न कारकों का एक्सचेंज रेट पर असर

रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि दोनों ऑपरेशंस को एक साथ करने से करेंसी मैनेजमेंट ज्यादा प्रभावी हो सकता है। फॉरेक्स रिजर्व में बदलाव की एक्सप्लेनेटरी पावर केवल 18 प्रतिशत थी, जिससे पता चलता है कि डॉलर इनफ्लो के बाद रिजर्व में भारी बढ़ोतरी से एक्सचेंज रेट में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता है। एफपीआई फ्लो अकेले देखने पर महत्वपूर्ण थे लेकिन अन्य वैरिएबल्स के साथ मिलाने पर उनका महत्व खत्म हो गया। एक्सचेंज रेट को चलाने वाले कारक कई रास्तों से आते हैं और इन्हें सांख्यिकीय रूप से अलग करने पर कोई एक मुख्य वैरिएबल सामने नहीं आता है। जांच किए गए वैरिएबल्स ने रुपये में होने वाले बदलाव का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा नहीं बताया है। वहीं सेंटीमेंट जिसमें इम्पोर्टर और एक्सपोर्टर की खरीद और रेमिटेंस का समय शामिल है, ने उस बड़े हिस्से को संभाला है जो विश्लेषण में शामिल नहीं था।

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