आरबीआई समिति की चेतावनी, राज्यों द्वारा जनवरी-मार्च तिमाही में अधिक कर्ज लेने से बढ़ सकती है उधारी लागत

आरबीआई समिति की चेतावनी, राज्यों द्वारा जनवरी-मार्च तिमाही में अधिक कर्ज लेने से बढ़ सकती है उधारी लागत

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा नियुक्त एक समिति ने कहा है कि जो राज्य अपनी वार्षिक मार्केट बोरोइंग का बड़ा हिस्सा जनवरी-मार्च तिमाही में केंद्रित करते हैं, उससे सभी राज्यों के लिए बोरोइंग कॉस्ट बढ़ सकती है। यह बात रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी रिपोर्ट ऑफ द एडवाइजरी कमेटी ऑन वेज एंड मीन्स एडवांसेज टू स्टेट गवर्नमेंट्स में कही गई है। समिति ने पाया है कि कुछ राज्य वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही के दौरान अपनी वार्षिक मार्केट बोरोइंग का एक बड़ा हिस्सा जुटाने का प्रयास करते हैं।

राज्यों ने इसके पीछे कई कारण बताए हैं जैसे कि वर्ष के दूसरे भाग में अधिक खर्च होना, केंद्र से प्राप्त बोरोइंग की अनुमति का उपयोग करने की आवश्यकता और अगले वित्तीय वर्ष की शुरुआत में पर्याप्त कैश बनाए रखना। हालांकि, समिति ने स्पष्ट किया है कि इस तरीके से लागत बढ़ती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्केट में स्टेट गवर्नमेंट सिक्योरिटीज की अधिक सप्लाई के कारण चौथी तिमाही के दौरान यह सभी राज्यों के लिए बोरोइंग कॉस्ट को ऊपर धकेल सकता है।

  • आरबीआई समिति ने राज्यों को पूरे वर्ष के दौरान अपनी मार्केट बोरोइंग को समान रूप से फैलाने पर विचार करने की सिफारिश की है।
  • राज्यों के इस प्रकार के बोरोइंग पैटर्न से वित्तीय वर्ष के अंत में उनके पास बड़े पैमाने पर निष्क्रिय कैश बैलेंस बचा रह सकता है।
  • समिति ने वित्तीय वर्ष 2026-27 से राज्य सरकार की उधारी के लिए शुरू की गई आरबीआई की बेंचमार्क इश्यूएंस स्ट्रेटजी का समर्थन किया है।
  • अधिकांश राज्यों ने इसे पहले ही अपना लिया है और शेष राज्यों से जल्द से जल्द ऐसा करने की सिफारिश की गई है।
  • साल 2025-26 में इंटरमीडिएट ट्रेजरी बिल और ऑक्शन ट्रेजरी बिल में राज्यों का औसत निवेश लगभग 3 लाख करोड़ रुपये था।

राज्यों के कैश मैनेजमेंट और नेगेटिव कैरी को लेकर चिंताएं

रिपोर्ट में राज्यों के बीच व्यापक कैश मैनेजमेंट की चिंताओं को भी उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि कुछ राज्य मार्केट से बोरोइंग जारी रखते हुए बड़े एहतियाती कैश बैलेंस बनाए रखते हैं, जिसके परिणामस्वरूप नेगेटिव कैरी की स्थिति पैदा होती है। नेगेटिव कैरी का अर्थ है कि बोरोइंग की लागत निष्क्रिय फंड पर मिलने वाले रिटर्न की तुलना में अधिक होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025-26 में इंटरमीडिएट ट्रेजरी बिल और ऑक्शन ट्रेजरी बिल में राज्यों का औसत निवेश लगभग 3 लाख करोड़ रुपये था, जबकि साल 2024-25 में यह 3.05 लाख करोड़ रुपये था। समिति ने कहा है कि राज्यों को कैश मैनेजमेंट में सुधार करना चाहिए। जब आरबीआई की लिक्विडिटी सुविधाएं उपलब्ध हों, तो राज्यों को केवल शॉर्ट-टर्म mismatches को पूरा करने के लिए मार्केट बोरोइंग का उपयोग करने से बचना चाहिए।

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