चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार लोकसभा में ओम बिरला दोनों संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल

चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार लोकसभा में ओम  बिरला दोनों संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल

ज्ञानेश कुमार से आगे: चुनाव, संसद और लोकतंत्र पर उठते सवाल

त्वरित सारांश:
मुख्य सवाल केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका तक सीमित नहीं है। 2014 के बाद चुनाव आयोग, संसद, राजनीतिक फंडिंग, विपक्षी नेताओं पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई और चुनावी प्रतिस्पर्धा के माहौल को लेकर लगातार बहस हुई है। इन घटनाओं को एक साथ देखने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विपक्ष के लिए समान राजनीतिक मैदान जैसे सवाल सामने आते हैं, हालांकि इन घटनाओं को किसी एक समन्वित योजना का प्रमाण मानना अलग और अधिक गंभीर दावा होगा।

नई दिल्ली /25 सितंबर 2026 /जनता आवाज़ न्यूज रिसोर्स

सवाल सिर्फ ज्ञानेश कुमार का नहीं

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग और संसद दो ऐसी संस्थाएं हैं जिनकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता का सीधा संबंध जनता के विश्वास से है। इसलिए जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठते हैं तो बहस केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह सकती। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था।

इसी तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी इस बहस के केंद्र में आते हैं। बिरला जून 2024 में लगातार दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष चुने गए। विपक्ष लंबे समय से सदन में निलंबन, चर्चा के अवसर और विपक्षी आवाज को लेकर सवाल उठाता रहा है। दूसरी तरफ सरकार और सत्तापक्ष की ओर से संसदीय कार्रवाई को नियमों और सदन की व्यवस्था के अनुसार चलाए जाने की बात कही जाती रही है।

इसलिए वास्तविक सवाल यह है कि क्या 2014 के बाद भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत संरचना में ऐसा कोई बदलाव आया है जिससे सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल गया? इसका जवाब किसी एक घटना से नहीं, बल्कि पिछले करीब 12 वर्षों के घटनाक्रम को साथ रखकर तलाशना होगा।

2014 से पहले और बाद की तस्वीर

2014 को भारतीय राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक मोड़ माना जाता है। उस चुनाव में भाजपा ने 282 लोकसभा सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस 44 सीटों पर रह गई थी। 2019 में भाजपा की सीटें बढ़कर 303 हो गईं।

2024 में तस्वीर बदली। भाजपा 240 सीटों पर रही और सरकार बनाने के लिए उसे सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ी। चुनाव आयोग ने 2024 के लिए विस्तृत परिणाम और पार्टीवार आंकड़े प्रकाशित किए हैं।

इस बदलाव को केवल संस्थागत प्रभाव से जोड़ना सही नहीं होगा। चुनाव परिणामों में मतदाताओं की पसंद, राजनीतिक गठबंधन, उम्मीदवारों का प्रदर्शन, क्षेत्रीय मुद्दे, जातीय-सामाजिक समीकरण, सरकार के कामकाज और विपक्ष की रणनीति सहित अनेक कारक भूमिका निभाते हैं।

2014 से पहले और बाद में गैर-हिंदू प्रतिनिधित्व

भारत के संवैधानिक ढांचे में किसी पद के लिए धर्म आधारित पात्रता नहीं है। इसलिए संसद, विधानसभा, मंत्रिमंडल या राष्ट्रपति पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति या चुनाव को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता। फिर भी प्रतिनिधित्व की चर्चा में कुछ ऐतिहासिक तथ्य महत्वपूर्ण हैं।

पद 2014 से पहले के प्रमुख उदाहरण 2014 के बाद की स्थिति/उदाहरण
राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम 2017 से रामनाथ कोविंद और 2022 से द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति रहीं
प्रधानमंत्री किसी गैर-हिंदू व्यक्ति ने भारत के प्रधानमंत्री का पद नहीं संभाला नरेंद्र मोदी 2014 से प्रधानमंत्री हैं; 2024 में तीसरी बार सरकार बनी
उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी सहित विभिन्न समुदायों के व्यक्ति 2017-2022 हामिद अंसारी के बाद जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति रहे
केंद्रीय मंत्री विभिन्न सरकारों में मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य समुदायों के मंत्री रहे 2024 के केंद्रीय मंत्रिमंडल में किरेन रिजिजू, हरदीप सिंह पुरी, जॉर्ज कुरियन आदि जैसे गैर-हिंदू मंत्री शामिल रहे
सांसद आजादी के बाद से मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य समुदायों के अनेक सांसद 2014, 2019 और 2024 में भी विभिन्न धार्मिक समुदायों के सांसद चुने गए
विधायक सभी प्रमुख राज्यों में अलग-अलग समुदायों के विधायक रहे 2014 के बाद भी राज्यों की विधानसभाओं में विभिन्न धार्मिक समुदायों के प्रतिनिधि चुने गए

2024 के केंद्रीय मंत्रिमंडल की राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी आधिकारिक सूची में हरदीप सिंह पुरी, किरेन रिजिजू और जॉर्ज कुरियन सहित कई गैर-हिंदू नाम शामिल हैं।

इसलिए यह कहना कि 2014 के बाद गैर-हिंदुओं को पूरी तरह सत्ता-संरचना से बाहर कर दिया गया, उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से सिद्ध नहीं होता। हां, संसद और विधानसभाओं में धार्मिक प्रतिनिधित्व के अनुपात, मुस्लिम प्रतिनिधित्व में कमी तथा राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण जैसे मुद्दों पर अलग से गंभीर अध्ययन की जरूरत है।

2024 का चुनाव और विपक्ष पर कार्रवाई

2024 का लोकसभा चुनाव इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। मतदान अप्रैल से जून 2024 के बीच हुआ। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार कुल मतदान प्रतिशत करीब 66.10 प्रतिशत रहा, जबकि 2019 में यह 67.40 प्रतिशत था।

लेकिन चुनाव से पहले विपक्षी दलों के सामने कई घटनाएं हुईं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को 21 मार्च 2024 को प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली की शराब नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किया। यह गिरफ्तारी लोकसभा चुनाव शुरू होने से कुछ सप्ताह पहले हुई थी। आम आदमी पार्टी ने इसे राजनीतिक कार्रवाई बताया, जबकि जांच एजेंसी और सरकार का पक्ष अलग था।

इसी तरह झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जनवरी 2024 में प्रवर्तन निदेशालय की जमीन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान गिरफ्तार किया गया था। विपक्ष ने इन कार्रवाइयों को चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव के रूप में देखा, जबकि एजेंसियों ने इन्हें कानूनी जांच की प्रक्रिया बताया।

इस पूरे घटनाक्रम में एक जरूरी अंतर समझना होगा। किसी नेता की गिरफ्तारी अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से की गई थी। लेकिन चुनाव के ठीक पहले प्रमुख विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक समानता पर सवाल जरूर पैदा कर सकती है। इन दोनों बातों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं बनाया जा सकता।

कांग्रेस के बैंक खाते और चुनावी संसाधन

2024 के चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के बैंक खातों को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ। आयकर संबंधी मामलों में कांग्रेस के कुछ खाते फ्रीज किए गए और पार्टी ने आरोप लगाया कि इससे चुनाव प्रचार की उसकी क्षमता प्रभावित हुई। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार उस समय आयकर विवाद में करीब 1.35 अरब रुपये की टैक्स रिकवरी का मामला सामने था और कांग्रेस ने इसे चुनाव से पहले लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था। दूसरी ओर आयकर विभाग का पक्ष था कि टैक्स की मांग पहले की अवधि से संबंधित थी और इसे चुनाव के साथ जोड़ना उचित नहीं था।

यहां भी दो अलग तथ्य हैं—एक है खाते फ्रीज होना और दूसरा है इसके पीछे राजनीतिक मंशा साबित होना। पहला दस्तावेजी तथ्य है, दूसरा राजनीतिक व्याख्या है।

इलेक्टोरल बॉन्ड: सबसे बड़ा संस्थागत विवाद

राजनीतिक फंडिंग के सवाल पर 2024 में सुप्रीम कोर्ट का इलेक्टोरल बॉन्ड फैसला बेहद महत्वपूर्ण रहा।

15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना और उससे जुड़े कुछ कानूनी प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया। अदालत ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की जानकारी मतदाताओं के सूचना के अधिकार से जुड़ी माना।

इसके बाद सार्वजनिक किए गए आंकड़ों से सामने आया कि 2018 से 2024 के बीच इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए लगभग 16,500 करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीदे गए और भाजपा सबसे बड़ी प्राप्तकर्ता थी। Reuters के अनुसार उपलब्ध आंकड़ों में भाजपा को करीब आधा धन मिला था।

यह तथ्य राजनीतिक फंडिंग में संसाधनों की असमानता पर बहस को मजबूत करता है। लेकिन इसे सीधे चुनाव परिणामों का कारण घोषित करना अलग दावा होगा, जिसके लिए अलग प्रमाण की आवश्यकता होगी।

वोटर लिस्ट और मतदान प्रतिशत का सवाल

2024 में मतदाता सूची और मतदान प्रतिशत भी राजनीतिक बहस का विषय बने। विपक्षी नेताओं ने कई स्थानों पर मतदाता सूची में नाम हटाए जाने और मतदान आंकड़ों में बदलाव पर सवाल उठाए।

लेकिन यहां भी चुनाव आयोग के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों को देखना जरूरी है। आयोग के 2024 एटलस के अनुसार 2024 में 64.64 करोड़ वोट पड़े, जबकि 2019 में यह संख्या 61.47 करोड़ थी। 2024 में कुल मतदाता संख्या लगभग 97.98 करोड़ थी।

इसलिए मतदान के आंकड़े में बदलाव को अपने आप में वोटों की हेराफेरी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि किसी विशेष बूथ या निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या मतदान रिकॉर्ड में अनियमितता का आरोप है, तो उसका मूल्यांकन बूथवार रिकॉर्ड, फॉर्म, शिकायत और चुनाव आयोग के जवाब के आधार पर किया जाना चाहिए।

मीडिया की भूमिका: 'गोदी मीडिया' से आगे की बहस

चुनावी राजनीति में मीडिया की भूमिका भी 2014 के बाद बहुत विवादित रही है। विपक्षी दलों और आलोचकों ने कई बड़े मीडिया संस्थानों को 'गोदी मीडिया' जैसे शब्दों से संबोधित किया। दूसरी तरफ मीडिया संस्थानों और पत्रकारों ने इस आरोप को राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रेरित बताया।

इस विवाद का तथ्यात्मक समाधान यह देखना है कि किस चैनल या अखबार ने किस राजनीतिक दल को कितना समय दिया, किन मुद्दों को प्रमुखता दी, किस प्रकार की भाषा इस्तेमाल की और क्या संपादकीय सामग्री तथा विज्ञापन सामग्री के बीच स्पष्ट अंतर रखा गया।

सिर्फ किसी मीडिया संस्थान की राजनीतिक लाइन पसंद या नापसंद होने से उसे निष्पक्ष या पक्षपाती साबित नहीं किया जा सकता।

'सभी कड़ियों को जोड़कर देखें'—लेकिन प्रमाण के साथ

यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बहस सबसे ज्यादा संवेदनशील हो जाती है। केजरीवाल की गिरफ्तारी, हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी, कांग्रेस के खातों पर कार्रवाई, इलेक्टोरल बॉन्ड, विपक्ष की शिकायतें, चुनाव आयोग पर सवाल और मीडिया की भूमिका—इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक व्यापक लोकतांत्रिक संदर्भ में देखना जरूरी है।

लेकिन इन घटनाओं को जोड़कर सीधे यह निष्कर्ष निकालना कि एक ही सुनियोजित योजना के तहत विपक्ष को कमजोर किया गया, उसके लिए ठोस प्रमाण की जरूरत होगी। फिलहाल उपलब्ध दस्तावेज अलग-अलग घटनाओं को प्रमाणित करते हैं; इन सभी के पीछे एक ही समन्वित योजना थी, यह अलग से स्थापित किया जाना बाकी है।

यही फर्क पत्रकारिता और राजनीतिक आरोप के बीच है।

मोदी सरकार को मिली चुनावी सफलता का सवाल

एक दूसरा बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकार की नीतियों से जनता इतनी परेशान थी तो 2014, 2019 और 2024 में भाजपा को इतनी बड़ी राजनीतिक सफलता कैसे मिली?

इसका जवाब भी केवल एक कारण में नहीं है।

2014 में भाजपा को 282 लोकसभा सीटें मिलीं और 2019 में 303। 2024 में उसकी सीटें घटकर 240 हुईं, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन हासिल किया।

चुनाव परिणाम यह नहीं बताते कि प्रत्येक मतदाता ने केवल सरकार के कामकाज पर वोट दिया। मतदाता स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, धार्मिक पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाएं, नेतृत्व, विपक्षी गठबंधन, स्थानीय समस्याएं और अन्य अनेक कारणों को ध्यान में रख सकता है।

इसलिए सरकार की आलोचना और चुनावी जीत एक-दूसरे के विरोधाभास नहीं हैं। लोकतंत्र में मतदाता किसी सरकार की कुछ नीतियों से असंतुष्ट होते हुए भी उसी दल या गठबंधन को वोट दे सकता है।

असली प्रश्न: संस्थाओं पर जनता का भरोसा

ज्ञानेश कुमार, ओम बिरला या किसी एक राजनीतिक दल से आगे जाकर असली प्रश्न संस्थाओं की विश्वसनीयता का है।

चुनाव आयोग को लेकर सवाल उठें तो उसके जवाब आंकड़ों और दस्तावेजों से आने चाहिए। संसद में विपक्ष शिकायत करे तो सदन की कार्यवाही, निलंबन, चर्चा के अवसर और विधायी प्रक्रिया के आंकड़े सामने आने चाहिए। राजनीतिक फंडिंग पर विवाद हो तो चंदे की पूरी पारदर्शी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल हों तो सभी दलों के खिलाफ कार्रवाई के आंकड़ों की तुलना की जानी चाहिए।

लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन मतदान करने का नाम नहीं है। निष्पक्ष चुनाव के साथ-साथ राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर, स्वतंत्र संस्थाएं, पारदर्शी राजनीतिक फंडिंग, स्वतंत्र मीडिया, मजबूत न्यायपालिका और प्रभावी संसदीय विपक्ष भी उसकी बुनियादी शर्तें हैं।

2014 के बाद भारत की राजनीति में सत्ता का केंद्रीकरण, मजबूत नेतृत्व, विपक्ष का पुनर्गठन, क्षेत्रीय दलों की भूमिका और संस्थागत स्वतंत्रता जैसे मुद्दे लगातार बहस में रहे हैं। 2024 का चुनाव यह भी दिखाता है कि मतदाता का फैसला किसी एक स्थायी राजनीतिक समीकरण से तय नहीं होता।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि केवल ज्ञानेश कुमार दोषी हैं या केवल ओम बिरला जिम्मेदार हैं। सवाल यह होना चाहिए कि क्या भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं हर नागरिक, हर राजनीतिक दल और हर विचारधारा के लिए समान भरोसे के साथ काम कर रही हैं?

इस प्रश्न का जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, आंकड़ों, संस्थागत पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच से ही निकलेगा

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