चुनावी वादों के लिए पैसा, तो UPI मुफ्त रखने के लिए क्यों नहीं?

चुनावी वादों के लिए पैसा, तो UPI मुफ्त रखने के लिए क्यों नहीं?

चुनावी वादों के लिए पैसा है तो UPI के लिए क्यों नहीं? डिजिटल अर्थव्यवस्था पर उठते बड़े सवाल

नई दिल्ली/16 सितंबर 2026 /जनता आवाज़ न्यूज रिसोर्स

देश में जब भी चुनावों का बिगुल बजता है, राजनीतिक दलों और सरकारों की ओर से लोकलुभावन वादों की झड़ी लग जाती है। मुफ्त बिजली, नकद वित्तीय सहायता, महिलाओं के खातों में हर महीने सीधे पैसे ट्रांसफर, मुफ्त बस यात्रा, राशन वितरण और तरह-तरह की योजनाओं पर केंद्र से लेकर राज्य सरकारें सालाना हजारों करोड़ रुपये का बजट आवंटित करती हैं। राजनीति और आर्थिक विशेषज्ञों के बीच इन योजनाओं को अक्सर “रेवड़ी कल्चर” या लोकलुभावन कल्याणकारी नीति कहकर संबोधित किया जाता है।

लेकिन इस भारी-भरकम सरकारी खर्च और बजटीय प्राथमिकताओं के बीच अब एक नया और तीखा सवाल खड़ा हो गया है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI पर Merchant Discount Rate (MDR) या संभावित शुल्क लगाए जाने की जारी बहस के बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं और आर्थिक विश्लेषकों ने सरकार की नीतियों पर उंगली उठाई है। सोशल एक्टिविस्ट मयंक नाथ का कहना है कि जब वोटरों को आकर्षित करने वाली योजनाओं के लिए सरकारें आसानी से लाखों करोड़ रुपये का बजट निकाल सकती हैं, तो फिर देश की पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत रीढ़ बन चुके UPI को पूरी तरह मुफ्त रखने का खर्च सरकार खुद क्यों नहीं उठा सकती?

UPI ने पिछले कुछ वर्षों में भारत के आम नागरिक, छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े व्यवसायियों तक के लेन-देन के तरीके को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। आज सब्जी खरीदने से लेकर बड़े व्यावसायिक भुगतान तक के लिए देश का हर वर्ग UPI पर निर्भर है। इसने न केवल नकद पर निर्भरता को कम किया है, बल्कि वित्तीय समावेशन और पारदर्शिता को भी एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है।

हालांकि, इस विश्वस्तरीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने, सर्वर क्षमता बढ़ाने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और बैंकिंग नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने में फिनटेक कंपनियों और बैंकों को भारी परिचालन लागत उठानी पड़ती है। जब तक सरकार बैंकों और पेमेंट सेवा प्रदाताओं को सब्सिडी देती है, तब तक आम उपभोक्ताओं और मर्चेंट्स के लिए यह सेवा मुफ्त रहती है। लेकिन समय-समय पर इस सब्सिडी को कम करने या व्यावसायिक लेन-देन पर मामूली शुल्क (MDR) लगाने की बातें सामने आती रहती हैं।

यही वह बिंदु है जहां से नीतिगत प्राथमिकताओं का विवाद शुरू होता है। यदि UPI पर किसी भी रूप में शुल्क लगाया जाता है, तो इसका सीधा असर छोटे व्यापारियों और आम जनता पर पड़ेगा। लोग एक बार फिर नकद लेन-देन की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे डिजिटल इंडिया मिशन की गति धीमी पड़ने का जोखिम रहेगा।

विशेषज्ञों का तर्क है कि जिस तरह सड़कें, पुल और राष्ट्रीय राजमार्ग देश का भौतिक बुनियादी ढांचा हैं, ठीक उसी तरह UPI देश का डिजिटल बुनियादी ढांचा (Digital Public Infrastructure) है। जिस प्रकार सरकारें सार्वजनिक परिवहन या अन्य सेवाओं के रखरखाव के लिए राष्ट्रीय खजाने से पैसा देती हैं, उसी प्रकार UPI के निर्बाध संचालन के लिए भी स्थायी बजटीय आवंटन होना चाहिए।

सवाल यह नहीं है कि जनहित की योजनाएं बंद होनी चाहिए या नहीं। सवाल प्राथमिकताओं के संतुलन का है। अगर चुनाव जीतने और जनभावनाओं को साधने के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया जा सकता है, तो देश के आर्थिक ढांचे को सशक्त बनाने वाले और करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन को आसान बनाने वाले प्लेटफॉर्म को हमेशा के लिए मुफ्त रखना कोई असंभव कार्य नहीं है।

सरकार को UPI के लिए कमाई का कोई ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे इसका बोझ आम जनता या छोटे दुकानदारों की जेब पर न पड़े। डिजिटल क्रांति को टिकाऊ और सर्वसुलभ बनाए रखने का एकमात्र समाधान यही है कि इसके रखरखाव का खर्च देश के डिजिटल विकास बजट का एक स्थाई हिस्सा बने।

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