आधार कार्ड का सच: किसका प्रोजेक्ट, डेटा किसके पास, खर्च कितना?

भारत की 140 करोड़ जनता की बायोमेट्रिक पहचान और आधार कार्ड का पूरा सच अब सवालों के घेरे में है। यूपीए-2 शासनकाल से शुरू हुई यह महत्वाकांक्षी योजना आज आम जनता के लिए सुविधा कम और सिरदर्द ज्यादा बन चुकी है। जानिए किसने बनाया आधार, कंपनियों को कैसे मिले अरबों के ठेके, साइबर अपराध और रिश्वतखोरी के बीच क्या सचमुच सुरक्षित है आपका डेटा।
नई दिल्ली/राष्ट्रिय डेस्क | जनता आवाज़ न्यूज रिसोर्स /01/10/2026
आधार कार्ड का असली सच: किसकी सोच, किसको फायदा और जनता पर कितना बढ़ा बोझ?
भारत में रहने वाले हर नागरिक के हाथ में आज 12 अंकों का एक पहचान पत्र है, जिसे आधार कार्ड कहा जाता है। बैंक खाते से लेकर मोबाइल सिम, पैन कार्ड, राशन, स्वास्थ्य सेवाएं और पासपोर्ट तक हर जगह आधार अनिवार्य कर दिया गया है। लेकिन सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यह है कि जिस आधार कार्ड पर देश की पूरी अर्थव्यवस्था और नागरिकों की व्यक्तिगत सुरक्षा टिकी है, उसका खुद का कानूनी आधार क्या है?
आधार कार्ड की सोच सबसे पहले साल 2009 में यूपीए-2 (कांग्रेस नीत) सरकार के दौरान सामने आई थी। तब इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि को भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) का पहला अध्यक्ष बनाया गया था। इसके बाद साल 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इसे और अधिक आक्रामक तरीके से पूरे देश में लागू कर दिया। लेकिन जिस मकसद के लिए इसे शुरू किया गया था, वह मकसद आज भटकता हुआ नजर आ रहा है।
जनता के मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि इस विशालकाय बायोमेट्रिक प्रोजेक्ट का ठेका किन कंपनियों को दिया गया? आधार प्रणाली के निर्माण, फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैनिंग सॉफ्टवेयर के विकास के लिए 'मोंटे कार्लो' (L-1 Identity Solutions) और 'सफरान मोर्फो' (Safran Morpho) जैसी विदेशी कंपनियों को बड़े ठेके दिए गए। आरोप लगते रहे हैं कि भारतीय नागरिकों का बेहद संवेदनशील डेटा विदेशी सॉफ्टवेयर और निजी सर्वरों के संपर्क में आया, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल खड़े हुए।
इतना ही नहीं, डेटा मैनेजमेंट और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो और एचसीएल जैसी देश-विदेश की दिग्गज प्राइवेट कंपनियों को अरबों रुपये के कांट्रैक्ट सौंपे गए। सवाल यह उठता है कि क्या इतनी बड़ी निजी कंपनियों को देश के नागरिकों की निजी जानकारी तक पहुंच देना सही था? जब जनता का डेटा प्राइवेट कंपनियों के सर्वरों के आसपास घूम रहा है, तो डेटा लीक होने की स्थिति में जवाबदेही किसकी तय होगी?
आधार प्रोजेक्ट पर शुरुआत से लेकर अब तक केंद्र सरकार हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहा चुकी है। UIDAI की स्थापना से लेकर अब तक के बजटीय आवंटन की बात करें, तो आधार इंफ्रास्ट्रक्चर, नामांकन केंद्रों, प्रचार-प्रसार और सर्वर मेंटेनेंस पर 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा सरकारी खजाने से खर्च किए जा चुके हैं। यह सारा पैसा देश के आम करदाताओं की जेब से ही निकला है, जिसका हिसाब आज तक पारदर्शी तरीके से सामने नहीं आया।
सरकारी खजाने से अरबों खर्च करने के बाद भी सरकार ने जनता से अलग-अलग सेवाओं के नाम पर जमकर वसूली की। आधार कार्ड में नाम, पता, फोटो या बायोमेट्रिक अपडेट कराने के लिए नामांकन केंद्रों पर ₹50 से ₹100 तक वसूले जाते हैं। वहीं, नए प्लास्टिक पीवीसी (PVC) आधार कार्ड को प्रिंट कराने के लिए UIDAI सीधे पोर्टल के जरिए प्रति कार्ड ₹50 की फीस लेता है। जब यह सरकारी पहचान पत्र है, तो हर छोटे संशोधन और प्रिंटिंग पर जनता से बार-बार पैसे क्यों लिए जा रहे हैं?
अब बात करते हैं पीवीसी कार्ड और प्रिंटिंग के उस बड़े बाजार की, जिससे निजी वेंडरों को सीधा फायदा पहुंचाया गया। पहले कागज का आधार कार्ड डाक से मुफ्त आता था, लेकिन बाद में प्लास्टिक और पीवीसी कार्ड का चलन बढ़ा दिया गया। देश के हर गली-मोहल्ले में सीएससी (CSC) सेंटरों और साइबर कैफे में प्लास्टिक आधार कार्ड छापने का एक समानांतर कारोबार खड़ा हो गया। सवाल यह है कि बार-बार कार्ड प्रिंट करवाने की यह व्यवस्था क्या किसी खास लॉबी को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई?
सबसे बड़ा भ्रम आधार कार्ड की मान्यता को लेकर है। भारत का सुप्रीम कोर्ट और स्वयं UIDAI कई बार स्पष्ट कर चुका है कि आधार कार्ड सिर्फ आपकी पहचान (Identity) और पते का प्रमाण है, यह आपकी नागरिकता (Citizenship) या जन्मतिथि का कानूनी प्रमाण नहीं है। फिर भी स्थिति यह है कि सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तरों में इसके बिना कोई काम नहीं होता। कहीं यह अनिवार्य बताकर स्वीकार किया जाता है, तो कहीं मामूली तकनीकी खामी के कारण इसे खारिज कर दिया जाता है।
डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार के राज में आज जमीनी हकीकत यह है कि डिजिटल काम करवाना आसान होने के बजाय बेहद पेचीदा हो गया है। अगर किसी गरीब नागरिक के फिंगरप्रिंट घिस गए हैं या सर्वर डाउन है, तो उसे राशन की दुकान से मुफ्त अनाज तक नहीं मिलता। बैंक खातों में केवाईसी (KYC) के नाम पर आम जनता को घंटों लाइनों में खड़ा होना पड़ता है। कागजी काम खत्म करने का दावा करने वाली सरकार ने जनता को 'कागजी डिजिटल' के चक्रव्यूह में फंसा दिया है।
डिजिटल व्यवस्था आने के बाद दावा किया गया था कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट है। आधार अपडेट करने, बायोमेट्रिक ठीक करने और जनसेवा केंद्रों पर नया कार्ड बनवाने के नाम पर धड़ल्ले से अवैध वसूली हो रही है। ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में ऑपरेटर बायोमेट्रिक मशीन चलाने और आधार में सुधार करने के नाम पर गरीबों से मनमाने पैसे वसूल रहे हैं, और प्रशासन इस पर पूरी तरह खामोश बैठा है।
आधार लागू होने के बाद प्रशासनिक पारदर्शिता तो नहीं बढ़ी, लेकिन साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में भयानक बढ़ोतरी हुई है। फर्जी सिम कार्ड निकालने, एईपीएस (AePS - आधार इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम) के जरिए बायोमेट्रिक क्लोनिंग करके लोगों के बैंक खातों से पैसे उड़ाने के हजारों मामले रोज सामने आ रहे हैं। साइबर ठग लोगों के आधार और फिंगरप्रिंट की सिलिकॉन कॉपी बनाकर बैंक खाली कर रहे हैं, और पुलिस प्रशासन इन मामलों को सुलझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
जब देश में पहले से ही पासपोर्ट, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड और पैन कार्ड जैसी दर्जनों पहचान प्रणालियां मौजूद थीं, तो एक और कार्ड थोपने की क्या आवश्यकता थी? यदि सरकार को सब कुछ एक जगह जोड़ना ही था, तो पूरे देश के लिए एक ही सर्वमान्य और सुरक्षित 'One ID' कार्ड क्यों नहीं बनाया गया? हर काम के लिए नया नंबर और नया कार्ड जोड़ना जनता पर एक अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ बन चुका है।
आज स्थिति यह है कि आधार प्रणाली जगह-जगह फेल और नाकाम साबित हो रही है। आधार सर्वर की खराबी के कारण पेंशनधारियों को महीनों पेंशन नहीं मिलती, राशन कार्ड से नाम कट जाते हैं और छात्र छात्रवृत्ति से वंचित रह जाते हैं। जब भी कोई नागरिक अपनी शिकायत लेकर दफ्तरों के चक्कर काटता है, तो अधिकारी सिस्टम की खराबी का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं। इस पूरी व्यवस्था में आम नागरिक खुद को असहाय और प्रताड़ित महसूस कर रहा है।
निष्कर्ष के तौर पर, आधार कार्ड परियोजना जिस सुशासन और पारदर्शिता के वादे के साथ शुरू की गई थी, वह आज कॉर्पोरेट कंपनियों के मुनाफे और प्रशासनिक अव्यवस्था का जरिया बन चुकी है। अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद न तो डेटा सुरक्षित है और न ही जनता को भ्रष्टाचार से राहत मिली है। सरकार को चाहिए कि वह आधार व्यवस्था की तत्काल उच्च स्तरीय जांच कराए, कंपनियों के ठेकों को पारदर्शी बनाए और साइबर सुरक्षा को मजबूत कर आम जनता को इस डिजिटल उत्पीड़न से राहत दिलाए।